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सोमवार, 4 जनवरी 2021

मोक्ष का सागर : गंगासागर


Rajesh Mishra, Kolkata, Gangasagar


कई बार दौरा करने एवं वहां के लोगों से बातचीत के बाद राजेश मिश्रा को जो दिखा और पता चला उसी आधार पर मैं यह जानकारी आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ। यह सागर स्थल पहुंचने में पहले जितना दुर्गम था आज उतना ही सुगम हो गया है। धीरे धीरे यह सागर स्थल पिकनिक स्थल के रूप में परिणत होता जा रहा है। अब तो लोग कई धार्मिक कार्यक्रम जैसे भागवत गीता सप्ताह, रामकथा, कृष्णलीला, जनेऊ संस्कार, विवाह के लिए भी वहां कपिलमुनि मंदिर के सामने बने मंडप इस्तेमाल करने लगे हैं।

Rajesh Mishra, Kolkata

अंग्रेजों ने भी इस देश को साधु-संतों का देश कहा है। भारत की धरती ही एक मात्र जगह है जहां आस्था सिर चढ़कर बोलती है। यहां डूबते सूर्य को भी अर्घ्य प्रदान किया जाता है। पश्चिम बंगाल की जिस पावन भूमि में गंगा व सागर का संगम होता है उसे गंगासागर कहते हैं-राजेश मिश्रा। जिसे सागरद्वीप भी कहा जाता है। गंगासागर मेला देश में आयोजित होने वाले तमाम बड़े मेलों में से एक है। सागरद्वीप यानी गंगासागर में स्थित कपिलमुनि मंदिर के बारे में कहा जाता है कि आज से पांच हजार वर्ष पहले ही आम लोगों को उक्त धर्म स्थली की जानकारी मिल गयी थी। विभिन्न दस्तावेजों, पुस्तकों व लोगों से मिली जानकारी में पता चलता है कि कभी यह क्षेत्र जल डकैतों के लिये उत्तम क्षेत्र था और यहां उनका दबदबा था। गंगासागर एक सौ वर्ष प्राचीन सेवा संस्था बजरंग परिषद की ओर से जाते थे। तब वह लोग हाथों में भाला, डंडा व अन्य हथियार लेकर चलते थे। दुर्गम रास्ते पर वह लोग हारकिन की रौशनी में चलते थे और यही हारकिन वहां प्रकाश की व्यवस्था करती थी। तब कई लोग यहां आने से पहले अपना श्राद्ध करके आते थे कि पता नहीं वह घर वापस जा सकेंगे या नहीं।



विभिन्न दस्तावेज पुस्तकों व लोगों से मिली जानकारी में पता चलता है कि कभी यहां स्वामी विवेकानंद भी आ चुके हैं। गंगासागर क्षेत्र सागर, सुपरीडांगा, अंगूनबाड़ी, घोड़ामारा, लोहाचड़ा जैसे कथित द्वीपों से बना है। ऋगवेद, भागवद, रामायण, महाभारत व पुराणों में गंगासागर स्थित कपिलमुनि ऋषि का उल्लेख मिलता है। यह यही जगह है जहां धर्मराज युधिष्ठिर भी स्नान के लिये आये थे। एक ऐसा भी दौर था जब धार्मिक कारणों से लोग यहां सागर व गंगा की संगम स्थली में अपने संतान का विसर्जन भी कर देते थे। लेकिन मार्कस वायलेसी ने वर्ष 1802 में उक्त परम्परा पर सख्ती से रोक लगा दी। संतान का विसर्जन की बात का उल्लेख कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता ‘विसर्जन’ में है। स्थानीय लोगों व दस्तावेजों से पता चलता है कि पाल, गुप्त व सेन राजाओं ने यहां राज किया था। महाकवि कालीदास से लेकर कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं में गंगासागर का उल्लेख मिलता है।

गंगासागर मेला की ख्याति यहां वर्ष में एक बार लगने वाले मेले के तौर पर कम बल्कि मोक्षनगरी के तौर पर ही है जहां दुनिया भर से श्रद्धालु एक डुबकी में मोक्ष की कामना लेकर आते हैं। भगवान विष्णु के अवतारों में एक कपिल मुनि का यहां आश्रम है जो अब भव्यता के साथ संस्कार-निर्माण की ओर है। लगभग चार वर्ष से मंदिर के विस्तार का काम चल रहा था जो कि लगभग समापन की ओर ही है। यह मेला विक्रम संवत के अनुसार प्रतिवर्ष पौष माह के अन्तिम दिन लगता है। जिसे हम मकर संक्रांति का दिन कहते हैं। बर्फ से ढके हिमालय से आरम्भ होकर गंगा नदी धरती पर नीचे उतरती है और कलकल करती मां गंगा हरिद्वार से मैदानी स्थानों पर पहुँचती है। जोकि क्रमशः आगे बढ़ते हुए उत्तर प्रदेश के बनारस, प्रयाग से प्रवाहित होती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। यहीं पवित्र पावनी गंगा सागर से मिल जाती है। इस जगह को गंगासागर यानी 'सागर द्वीप' कहा जाता है।

यह क्षेत्र दक्षिण चौबीस परगना जिले में है और यहां जिला प्रशासन के द्वारा गंगा सागर मेले का आयोजन किया जाता है। प्रतिवर्ष इस मेले में लगभग दस लाख श्रद्धालु पुण्यस्नान के लिये आते हैं। वैसे जिले के अधिकारियों और कपिलमुनि मंदिर के के महंत ज्ञानदास के उत्तराधिकारी संजय दास ने बताया कि उन्हें उम्मीद है कि इस साल संगम में मकर संक्रांति के अवसर पर कम से कम 19 से 20 लाख पुण्यार्थी पुण्य स्नान करेंगे। उन्होंने गंगा सागर मेला पर सरकार की पीठ थपथपाते हुए कहा कि हर तरह की व्यवस्था की गई है। उन्होंने कहा कि उनके अनुमान के अनुसार हाजरों की संख्या में लोग सागरद्वीप में आकर भीड़ से बचने के लिये पुण्य स्नान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 15 जनवरी की सुबह 4 बजे लेकर दोपहर के 12 बजे तक मकार संक्रांति का पुण्य स्नान काल है। सागर में उदय कुम्भ के एक सवाल पर संजय दास ने कहा कि फिलहाल अगर यहां सेतू बन जाये तो उदय कुम्भ के आयोजन पर सोचा जाएगा।

उन्होंने कहा कि पु्ण्यार्थियों को किसी बात से डरने की जरुरत नहीं हैं और वह लोग बेखौफ होकर यहां पुण्य स्नान करें लेकिन वह लोग किसी लावारिस सामान को हाथ नहीं लगायें। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि यहां वीआईपी, वीवीआईपी आते हैं लेकिन उनके कारण आम लोगों को परेशानी का सामना भी करना पड़ता है। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि राज्य सरकार की व्यवस्था व सुरक्षा चुस्त व चाक चौबंद है। संजय दास ने कहा कि इस वर्ष मकर संक्रांति पर कम से कम 20 लाख श्रद्धालु पुण्यस्नान कर सकते हैं। यह स्थान हिन्दुओं के एक विशेष पवित्र स्थल के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि, गंगासागर की पवित्र तीर्थयात्रा सैकड़ों तीर्थ यात्राओं के समान है। शायद इसलिये ही कहा जाता है कि "हर तीर्थ बार–बार, गंगासागर एक बार।" लेकिन अब सागर तीर्थयात्रा काफी सुगम हो गई जिससे राजेश मिश्रा के शब्दो में कहा जा सकता है कि, गंगा सागर तीर्थ यात्रा अब बार-बार।


 
मान्यता है कि गंगासागर का पुण्य स्नान अगर विशेष रूप से मकर संक्रांति के दिन किया जाए तो उसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है और पुण्यार्थी को इस स्नान का विशेष पुण्य मिलता है। कारण मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। जिसका वैज्ञानिक आधर भी है। गंगासागर में तमाम जगहों से तीर्थयात्रियों के साथ ही साधु-संन्यासी आते हैं और संगम में स्नान कर ये लोग सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं। कपिल मुनि के साथ ही विशेष रुप ये यहां सूर्य देव की पूजा की जाती है। तिल और चावल सह यहां तेल का इस त्यौहार पर विशेष महत्व है जिसका दान किया जाता है। यहां साधु समाज की एक अलग दुनिया ही बस जाती है और नगा से लेकर बाल व महिला संन्यासियों के संसार व माहौल को देख कुंभ मेले का भान होता है। गंगासागर के संगम पर श्रद्धालु जहां समुन्द्र देवता को नारियल अर्पित करते हैं वहीं गउदान भी करते हैं। कहते हैं कि भवसागर को पार करने के लिये गउ की पूंछ का ही सहारा आत्मा को लेना पड़ता है तभी मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि यहां पंडे भाड़े की गाय लेकर उसे श्रद्धालु को बेचते हैं और फिर उसी गउ को वापस दान में लेते हैं। इसके उपरांत ही बाबा कपिल मुनि के दर्शन व पूजा-अर्चना की जाती है। गंगासागर में स्नान–दान का महत्व शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है। इसे जनश्रुति कहें या फिर मान्यता। कहते हैं कि जो युवतियाँ यहाँ पर स्नान करती हैं, उन्हें अपनी इच्छानुसार वर तथा युवकों को इच्छित वधु प्राप्त होती है। अनुष्ठान आदि के पश्चात् सभी लोग कपिल मुनि के आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं तथा श्रद्धा से उनकी मूर्ति की पूजा करते हैं। मन्दिर में गंगा देवी, कपिल मुनि तथा भागीरथी की मूर्तियाँ स्थापित हैं।

Rajesh Mishra, Kolkata, Kapilmuni Mandir, Gangasagar


तमाम ग्रंथों सह पुराणों में मां गंगा के धरती पर अवतरण की जानकारी मिलती है। भगवान श्री राम के कुल के राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ कर घोड़ा छोड़ा। अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की सुरक्षा का जिम्मा उन्होंने अपने 60 हज़ार पुत्रों को दिया। देवराज इंद्र ने वह घोड़ा चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बाँध दिया। घोड़े को खोजते हुए जब राजकुमार वहाँ पर पहुँचे तो कपिल मुनि को भला–बुरा कहने लगे और घोड़ा चोर समझा। मुनि को राजपुत्रों के इस क्रिया कलाप पर क्रोध आ गया और सभी 60 हज़ार सगर पुत्र मुनि की क्रोधाग्नि में जलकर भस्म हो गये। ऐसे में सगर के पुत्र अंशुमान ने मुनि से क्षमा–याचना की तथा राजकुमारों की मुक्ति का उपाय पूछा। मुनि ने कहा- स्वर्ग से मां गंगा को धरती पर लाना होगा और गंगा की जलधारा के स्पर्श भष्मिभूत 60 हज़ार सगर पुत्रो का उद्धार होगा। राजपुत्र अंशुमान को तप में सफलता नहीं मिली। फिर उन्हीं के कुल के भगीरथ ने तप करके स्वर्ग से गंगा को पृथ्वी पर उतारा। भगीरथ जैसे-जैसे जिस रास्ते से होकर गुजरे मां गंगा की अविरल धारा भी गुजरी। चूंकि राजपुत्रों को ऋषि के श्राप से मुक्त करना था अतएवं भगीरथ के साथ गंगा सागरद्वीप में आईं। कपिल आश्रम श्रेत्र में आयीं गंगा का स्पर्श जैसे ही सागर के साठ हजार मृत पुत्रों की राख से हुआ सभी राजकुमार मोक्ष को प्राप्त हुए। कहते हैं कि राजपुत्रों को मकर संक्रांति के दिन ही मुक्ति मिली थी। 


Rajesh Mishra, Kolkata, Gangasagar



भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं कपिल मुनि

भागवत पुराण में वर्णन है कि कपिल मुनि भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं। कपिल मुनि की माता का नाम देवहूति व पिता का नाम कर्दम ऋषि था। देवहूति को ब्रह्म जी की पुत्री बताया जाता है। कपिल मुनि ने अपनी मां देवहूति को बाल्यावस्था में सांख्य-शास्त्र का ज्ञान दिया था। उनकी मां मनु व शतरूपा की पुत्री भी कहा जाता है। शास्त्र ग्रंथ बताते हैं कि जब प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो उन्होंने अपने शरीर के आधे हिस्से से नारी का निर्माण किया। इन्हें मनु तथा शतरूपा कहा गया। देवहूति के पति थे ऋषि कर्दम। कपिल मुनि अपने माता-पिता की दसवीं संतान थे। उनसे पहले उनकी नौ बहनें थीं। कपिल मुनि महाराज ने जब सांख्य शास्त्र की रचना की थी तब बाल्यावस्था में ही कपिल मुनि महाराज ने अपनी माता को सृष्टि व प्रकृति के चौबीस तत्वों का ज्ञान प्रदान किया था। कहते हैं कि सांख्य दर्शन के माध्यम से जो तत्व ज्ञान मुनि महाराज ने अपनी माता देवहूति के सामने रखा था वही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के उपदेश के रूप में सुनाया था। कपिल मुनि का श्रीमद्भगवत गीता में वर्णन इस प्रकार से है-

अक्षत्थ: अश्रृत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद:। गन्धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलो मुनि:॥

अर्थात् भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि हे अर्जुन जितने भी वृक्ष हैं उनमें सबसे उत्तम वृक्ष पीपल का है और वो मैं हूं, देवों में नारद मैं हूं, सिद्धों में कपिल मैं हूं, ये मेरे ही अवतार हैं। मुनि महाराज ने माता को बताया था कि मनुष्य का शरीर देवताओं की भांति ही होता है।

Rajesh Mishra, Kolkata, Gangasagar Mela

Rajesh Mishra, Kolkata, Gangasagar


कैसे जायें सागरद्वीप 

महानगर कोलकाता के हावड़ा, सियालदा, आउटराम घाट और इस्पालानेड से 98 किलोमीटर की दूरी बस द्वारा लाट न. 8 तक तय की जा सकती है। वैसे आप सियालदा से ट्रेन द्वारा काकद्वीप स्टेशन जा सकते हैं। लेकिन बाकी का सफर मुड़़ीगंगा नदी को पार करना होगा। नदी पार करने के बाद भी बस से सागरद्वीप की ओर रवाना होना पड़ेगा।

Rajesh Mishra, Kolkata, Gangasagar Mela


यात्रा में क्या नहीं करें

खुले में शौच या लघुशंका नहीं करें। कारण लगभग 10 हजार शौचालय बनाये जाते हैं। मेले को स्वच्छ रखना ही सरकार की प्राथमिकता है इसलिये खुद गंदगी नहीं फैलाएं और ना ही दूसरों को मेला परिसर गंदा करने दें। सागर तट पर कपड़े नहीं धोएं और पूजन सामग्री संगम में नहीं फेंके। किसी भी रुप में प्लास्टिक को निषेध किया गया है अतएवं इसका ध्यान रखें। हुगला सह अन्य अस्थायी यात्री निवास में आग नहीं जलाएं। किसी अंजान का खाना नहीं खायें और अपने सामानों के प्रति सतर्क रहें।
Rajesh Mishra, Kolkata


मंगलवार, 25 अगस्त 2020

Dukh ho ya sukh Bhagwaan ko Dhanybad Karna chahiye

दुख हो या सुख, हमेशा भगवान का
धन्यवाद करना चाहिए
Jai Sri Krishna


एक बार गुरु जी से उनके शिष्य ने पूछा कि भगवान हमें सिर्फ कठनाई में ही क्यों याद आते हैं, जबकि खुशी में हम उन्हें उस प्रकार याद नहीं करते जितना दुख में याद करते हैं। महात्मा ने शिष्यों को समझाने के लिए उन्हें एक कथा सुनाई। महात्मा ने बताया कि एक निर्माणाधीन भवन की सातवीं मंजिल से ठेकेदार ने नीचे काम करने वाले मजदूर को आवाज दी। निर्माण कार्य की तेज आवाज के कारण मजदूर सुन न सका कि उसका ठेकेदार उसे आवाज दे रहा है।

ठेकेदार ने उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए एक 1 रुपये का सिक्का नीचे फेंका, जो ठीक मजदूर के सामने जाकर गिरा। मजदूर ने सिक्का उठाया और अपनी जेब में रख लिया और फिर अपने काम मे लग गया। मजदूर का ध्यान दोबारा अपनी ओर खींचने के लिए ठेकेदार ने इस बार 5 रुपये का सिक्का नीचे फेंका लेकिन उसने फिर वही किया, इसपर ठेकेदार ने 10 रुपये का सिक्का नीचे फेंका। उस मजदूर ने फिर वही किया और सिक्के जेब मे रख कर अपने काम मे लग गया।

इस पर ठेकेदार गुस्सा गया और उसने एक छोटा सा पत्थर उठाकर मजदूर के उपर फेंका जो सीधा मजदूर के सिर पर लगा। अब मजदूर ने ऊपर देखा और ठेकेदार से बात चालू हो गयी। बिल्कुल ऐसी ही घटनाएं हमारी जिंदगी में भी घटती रहती हैं।

भगवान हमसे संपर्क करना, मिलना चाहते हैं लेकिन हम दुनियादारी के कामों में इतने व्यस्त रहते हैं कि हम भगवान को याद नहीं करते। भगवान हमें छोटी-छोटी खुशियों के रूप में उपहार देता रहता है लेकिन हम उसे याद नहीं करते और वो खुशियां और उपहार कहां से आए यह न देखते हुए, उनका उपयोग कर लेते हैं और भगवान को याद ही नहीं करते।
Rajesh Mishra, Kolkata (Korona, Lockdown)

भगवान हमें और भी खुशियों रूपी उपहार भेजता है लेकिन उसे भी हम हमारा भाग्य समझ कर रख लेते हैं, भगवान् का धन्यवाद नहीं करते, उसे भूल जाते हैं। वहीं जब हमारे ऊपर कठनाई, दुख, परेशानी आदि रूपी कोई पत्थर हम पर पड़ता है तो हमें तुरंत ईश्वर याद आते हैं और इन परेशानियों के निराकरण के लिए भगवान की ओर देखते हैं, उन्हें याद करते हैं। यदि हम लोग भी अपनी छोटी-छोटी खुशी में भगवान को याद करें और उनका धन्यवाद दें तो हम हमेशा भगवान के आशीर्वाद के नीचे ही रहेंगे।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

Famous 16 Hanuman temples of India

🏼भारत के प्रसिद्ध 16 हनुमान मंदिर
Hanuman ji


भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थित 16 प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों के बारे में जानकारी । इनमे से हर मंदिर की अपनी एक विशेषता है कोई मंदीर अपनी प्राचीनता की लिये प्रसिद्ध है तो कोई मंदीर अपनी भव्यता के लिए।

जबकि कई मंदिर अपनी अनोखी हनुमान मूर्त्तियों के लिए जैसे की इलाहबाद का हनुमान मंदीर जहां की भारत की एक मात्र लेटे हुए हनूमान जी की प्रतिमा है। जबकि इंदौर के उलटे हनुमान मंदिर में भारत कि एक मात्र उलटे हनुमान कि प्रतिमा हैं।

इसी तरह रतनपुर के गिरिजाबंध हनुमान मंदिर में स्त्री रुप में हनुमान प्रतिमा है। इन सबसे अलग गुजरात के जामनगर के बाल हनूमान मंदीर का नाम एक अनोखे रिकॉर्ड क़े कारण गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।
Rajesh Mishra, Kolkata (Kanghal Hanuman mandir, Haridwar)

1👉 हनुमान मंदिर, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

इलाहाबाद किले से सटा यह मंदिर लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा वाला एक छोटा किन्तु प्राचीन मंदिर है। यह सम्पूर्ण भारत का केवल एकमात्र मंदिर है जिसमें हनुमान जी लेटी हुई मुद्रा में हैं। यहां पर स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा 20 फीट लम्बी है। जब वर्षा के दिनों में बाढ़ आती है और यह सारा स्थान जलमग्न हो जाता है, तब हनुमानजी की इस मूर्ति को कहीं ओर ले जाकर सुरक्षित रखा जाता है। उपयुक्त समय आने पर इस प्रतिमा को पुन: यहीं लाया जाता है।

2👉 हनुमानगढ़ी, अयोध्या

धर्म ग्रंथों के अनुसार अयोध्या भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है। यहां का सबसे प्रमुख श्रीहनुमान मंदिर हनुमानगढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर राजद्वार के सामने ऊंचे टीले पर स्थित है। इसमें 60 सीढिय़ां चढऩे के बाद श्री हनुमान जी का मंदिर आता है।
यह मंदिर काफी बड़ा है। मंदिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, जिनमें साधु-संत रहते हैं। हनुमानगढ़ी के दक्षिण में सुग्रीव टीला व अंगद टीला नामक स्थान हैं। इस मंदिर की स्थापना लगभग 300 साल पहले स्वामी अभया रामदास जी ने की थी।

3👉 सालासर बालाजी हनुमान मंदिर, सालासर (राजस्थान)

Rajesh Mishra, Kolkata in Salasar Dham 

हनुमानजी का यह मंदिर राजस्थान के चूरू जिले में है। गांव का नाम सालासर है, इसलिए सालासर वाले बालाजी के नाम यह मंदिर प्रसिद्ध है। हनुमानजी की यह प्रतिमा दाड़ी व मूंछ से सुशोभित है। यह मंदिर पर्याप्त बड़ा है। चारों ओर यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशालाएं बनी हुई हैं। दूर-दूर से श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और मनचाहा वरदान पाते हैं।
Salsar Balaji (Rajasthan)
इस मंदिर के संस्थापक श्री मोहनदासजी बचपन से श्री हनुमान जी के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। माना जाता है कि हनुमान जी की यह प्रतिमा एक किसान को जमीन जोतते समय मिली थी, जिसे सालासर में सोने के सिंहासन पर स्थापित किया गया है। यहाँ हर साल भाद्रपद, आश्विन, चैत्र एवं वैशाख की पूर्णिमा के दिन विशाल मेला लगता है।

4👉 हनुमान धारा, चित्रकूट, (उत्तर प्रदेश)

उत्तर प्रदेश के सीतापुर नामक स्थान के समीप यह हनुमान मंदिर स्थापित है। सीतापुर से हनुमान धारा की दूरी तीन मील है। यह स्थान पर्वतमाला के मध्यभाग में स्थित है। पहाड़ के सहारे हनुमानजी की एक विशाल मूर्ति के ठीक सिर पर दो जल के कुंड हैं, जो हमेशा जल से भरे रहते हैं और उनमें से निरंतर पानी बहता रहता है। इस धारा का जल हनुमानजी को स्पर्श करता हुआ बहता है।इसीलिए इसे हनुमान धारा कहते हैं।धारा का जल पहाड़ में ही विलीन हो जाता है। उसे लोग प्रभाती नदी या पातालगंगा कहते हैं। इस स्थान के बारे में एक कथा इस प्रकार प्रसिद्ध है -
श्रीराम के अयोध्या में राज्याभिषेक होने के बाद एक दिन हनुमानजी ने भगवान श्रीरामचंद्र से कहा- हे भगवन। मुझे कोई ऐसा स्थान बतलाइए, जहां लंका दहन से उत्पन्न मेरे शरीर का ताप मिट सके। तब भगवान श्रीराम ने हनुमानजी को यह स्थान बताया।

5👉 श्री संकटमोचन मंदिर, वाराणसी , (उत्तर प्रदेश)

यह मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में स्थित है। इस मंदिर के चारों ओर एक छोटा सा वन है। यहां का वातावरण एकांत, शांत एवं उपासकों के लिए दिव्य साधना स्थली के योग्य है। मंदिर के प्रांगण में श्रीहनुमानजी की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। श्री संकटमोचन हनुमान मंदिर के समीप ही भगवान श्रीनृसिंह का मंदिर भी स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि हनुमानजी की यह मूर्ति गोस्वामी तुलसीदासजी के तप एवं पुण्य से प्रकट हुई स्वयंभू मूर्ति है।इस मूर्ति में हनुमानजी दाएं हाथ में भक्तों को अभयदान कर रहे हैं एवं बायां हाथ उनके ह्रदय पर स्थित है। प्रत्येक कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमानजी की सूर्योदय के समय विशेष आरती एवं पूजन समारोह होता है। उसी प्रकार चैत्र पूर्णिमा के दिन यहां श्रीहनुमान जयंती महोत्सव होता है। इस अवसर पर श्रीहनुमानजी की बैठक की झांकी होती है और चार दिन तक रामायण सम्मेलन महोत्सव एवं संगीत सम्मेलन होता है।

🌹6👉 बेट द्वारका हनुमान दंडी मंदिर, (गुजरात)

बेट द्वारका से चार मील की दूरी पर मकर ध्वज के साथ में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है। कहते हैं कि पहले मकरध्वज की मूर्ति छोटी थी परंतु अब दोनों मूर्तियां एक सी ऊंची हो गई हैं। अहिरावण ने भगवान श्रीराम लक्ष्मण को इसी स्थान पर छिपा कर रखा था।

जब हनुमानजी श्रीराम-लक्ष्मण को लेने के लिए आए, तब उनका मकरध्वज के साथ घोर युद्ध हुआ। अंत में हनुमानजी ने उसे परास्त कर उसी की पूंछ से उसे बांध दिया। उनकी स्मृति में यह मूर्ति स्थापित है। कुछ धर्म ग्रंथों में मकरध्वज को हनुमानजी का पुत्र बताया गया है, जिसका जन्म हनुमानजी के पसीने द्वारा एक मछली से हुआ था।

7👉 मेहंदीपुर बालाजी मंदिर, मेहंदीपुर, (राजस्थान)
Mehandipur Balaji, Rajasthan

राजस्थान के दौसा जिले के पास दो पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ मेहंदीपुर नामक स्थान है। यह मंदिर जयपुर-बांदीकुई-बस मार्ग पर जयपुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर है। दो पहाडिय़ों के बीच की घाटी में स्थित होने के कारण इसे घाटा मेहंदीपुर भी कहते हैं। जनश्रुति है कि यह मंदिर करीब 1 हजार साल पुराना है। यहां पर एक बहुत विशाल चट्टान में हनुमान जी की आकृति स्वयं ही उभर आई थी। इसे ही श्री हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है।
इनके चरणों में छोटी सी कुण्डी है, जिसका जल कभी समाप्त नहीं होता। यह मंदिर तथा यहाँ के हनुमान जी का विग्रह काफी शक्तिशाली एवं चमत्कारिक माना जाता है तथा इसी वजह से यह स्थान न केवल राजस्थान में बल्कि पूरे देश में विख्यात है। कहा जाता है कि मुगल साम्राज्य में इस मंदिर को तोडऩे के अनेक प्रयास हुए परंतु चमत्कारी रूप से यह मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां ऊपरी बाधाओं के निवारण के लिए आने वालों का तांता लगा रहता है। मंदिर की सीमा में प्रवेश करते ही ऊपरी हवा से पीडि़त व्यक्ति स्वयं ही झूमने लगते हैं और लोहे की सांकलों से स्वयं को ही मारने लगते हैं। मार से तंग आकर भूत प्रेतादि स्वत: ही बालाजी के चरणों में आत्मसमर्पण कर देते हैं।

8👉 डुल्या मारुति, पूना, (महाराष्ट्र)

पूना के गणेशपेठ में स्थित यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है। श्रीडुल्या मारुति का मंदिर संभवत: 350 वर्ष पुराना है। संपूर्ण मंदिर पत्थर का बना हुआ है, यह बहुत आकर्षक और भव्य है। मूल रूप से डुल्या मारुति की मूर्ति एक काले पत्थर पर अंकित की गई है। यह मूर्ति पांच फुट ऊंची तथा ढाई से तीन फुट चौड़ी अत्यंत भव्य एवं पश्चिम मुख है। हनुमानजी की इस मूर्ति की दाईं ओर श्रीगणेश भगवान की एक छोटी सी मूर्ति स्थापित है। इस मूर्ति की स्थापना श्रीसमर्थ रामदास स्वामी ने की थी, ऐसी मान्यता है। सभा मंडप में द्वार के ठीक सामने छत से टंगा एक पीतल का घंटा है, इसके ऊपर शक संवत् 1700 अंकित है।

9👉 श्री कष्टभंजन हनुमान मंदिर, सारंगपुर, (गुजरात)

🌷अहमदाबाद-भावनगर रेलवे लाइन पर स्थित बोटाद जंक्शन से सारंगपुर लगभग 12 मील दूर है। यहां एक प्रसिद्ध मारुति प्रतिमा है। महायोगिराज गोपालानंद स्वामी ने इस शिला मूर्ति की प्रतिष्ठा विक्रम संवत् 1905 आश्विन कृष्ण पंचमी के दिन की थी। जनश्रुति है कि प्रतिष्ठा के समय मूर्ति में श्री हनुमान जी का आवेश हुआ और यह हिलने लगी। तभी से इस मंदिर को कष्टभंजन हनुमान मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर स्वामीनारायण सम्प्रदाय का एकमात्र हनुमान मंदिर है।

10👉 यंत्रोद्धारक हनुमान मंदिर, हंपी, (कर्नाटक)

बेल्लारी जिले के हंपी नामक नगर में एक हनुमान मंदिर स्थापित है। इस मंदिर में प्रतिष्ठित हनुमानजी को यंत्रोद्धारक हनुमान कहा जाता है। विद्वानों के मतानुसार यही क्षेत्र प्राचीन किष्किंधा नगरी है। वाल्मीकि रामायण व रामचरित मानस में इस स्थान का वर्णन मिलता है। संभवतया इसी स्थान पर किसी समय वानरों का विशाल साम्राज्य स्थापित था। आज भी यहां अनेक गुफाएं हैं। इस मंदिर में श्रीराम नवमी के दिन से लेकर तीन दिन तक विशाल उत्सव मनाया जाता है।
Rajesh Mishra, Kolkata

11👉 गिरजाबंध हनुमान मंदिर – रतनपुर – (छत्तीसगढ़)

बिलासपुर से 25 कि. मी. दूर एक स्थान है रतनपुर। इसे महामाया नगरी भी कहते हैं। यह देवस्थान पूरे भारत में सबसे अलग है। इसकी मुख्य वजह मां महामाया देवी और गिरजाबंध में स्थित हनुमानजी का मंदिर है। खास बात यह है कि विश्व में हनुमान जी का यह अकेला ऐसा मंदिर है जहां हनुमान नारी स्वरूप में हैं। इस दरबार से कोई निराश नहीं लौटता। भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है।

12👉 उलटे हनुमान का मंदिर, साँवेर उज्जैन रोड़, इंदौर (मध्यप्रदेश)

भारत की धार्मिक नगरी उज्जैन से केवल 30 किमी दूर स्थित है यह धार्मिक स्थान जहाँ भगवान हनुमान जी की उल्टे रूप में पूजा की जाती है। यह मंदिर साँवरे नामक स्थान पर स्थापित है इस मंदिर को कई लोग रामायण काल के समय का बताते हैं। मंदिर में भगवान हनुमान की उलटे मुख वाली सिंदूर से सजी मूर्ति विराजमान है। सांवेर का हनुमान मंदिर हनुमान भक्तों का महत्वपूर्ण स्थान है यहाँ आकर भक्त भगवान के अटूट भक्ति में लीन होकर सभी चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं। यह स्थान ऐसे भक्त का रूप है जो भक्त से भक्ति योग्य हो गया।

उलटे हनुमान कथा

*भगवान हनुमान के सभी मंदिरों में से अलग यह मंदिर अपनी विशेषता के कारण ही सभी का ध्यान अपनी ओर खींचता है। साँवेर के हनुमान जी के विषय में एक कथा बहुत लोकप्रिय है। कहा जाता है कि जब रामायण काल में भगवान श्री राम व रावण का युद्ध हो रहा था, तब अहिरावण ने एक चाल चली. उसने रूप बदल कर अपने को राम की सेना में शामिल कर लिया और जब रात्रि समय सभी लोग सो रहे थे,तब अहिरावण ने अपनी जादुई शक्ति से श्री राम एवं लक्ष्मण जी को मूर्छित कर उनका अपहरण कर लिया। वह उन्हें अपने साथ पाताल लोक में ले जाता है। जब वानर सेना को इस बात का पता चलता है तो चारों ओर हडकंप मच जाता है। सभी इस बात से विचलित हो जाते हैं। इस पर हनुमान जी भगवान राम व लक्ष्मण जी की खोज में पाताल लोक पहुँच जाते हैं और वहां पर अहिरावण से युद्ध करके उसका वध कर देते हैं तथा श्री राम एवं लक्ष्मण जी के प्राँणों की रक्षा करते हैं। उन्हें पाताल से निकाल कर सुरक्षित बाहर ले आते हैं। मान्यता है की यही वह स्थान था जहाँ से हनुमान जी पाताल लोक की और गए थे। उस समय हनुमान जी के पाँव आकाश की ओर तथा सर धरती की ओर था जिस कारण उनके उल्टे रूप की पूजा की जाती है।

13👉🏾 प्राचीन हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस, (नई दिल्ली)

यहां महाभारत कालीन श्री हनुमान जी का एक प्राचीन मंदिर है। यहाँ पर उपस्थित हनुमान जी स्वंयम्भू हैं। बालचन्द्र अंकित शिखर वाला यह मंदिर आस्था का महान केंद्र है। दिल्ली का ऐतिहासिक नाम इंद्रप्रस्थ शहर है, जो यमुना नदी के तट पर पांडवों द्वारा महाभारत-काल में बसाया गया था। तब पांडव इंद्रप्रस्थ पर और कौरव हस्तिनापुर पर राज्य करते थे। ये दोनों ही कुरु वंश से निकले थे। हिन्दू मान्यता के अनुसार पांडवों में द्वितीय भीम को हनुमान जी का भाई माना जाता है। दोनों ही वायु-पुत्र कहे जाते हैं। इंद्रप्रस्थ की स्थापना के समय पांडवों ने इस शहर में पांच हनुमान मंदिरों की स्थापना की थी। ये मंदिर उन्हीं पांच में से एक है।

14👉 श्री बाल हनुमान मंदिर, जामनगर, (गुजरात)

सन् 1540 में जामनगर की स्थापना के साथ ही स्थापित यह हनुमान मंदिर, गुजरात के गौरव का प्रतीक है। यहाँ पर सन् 1964 से “श्री राम धुनी” का जाप लगातार चलता आ रहा है, जिस कारण इस मंदिर का नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया है।

15👉 महावीर हनुमान मंदिर, पटना, (बिहार)
Hanuman Mandir, Patna, Bihar

पटना जंक्शन के ठीक सामने महावीर मंदिर के नाम से श्री हनुमान जी का मंदिर है। उत्तर भारत में माँ वैष्णों देवी मंदिर के बाद यहाँ ही सबसे ज्यादा चढ़ावा आता है। इस मंदिर के अन्तर्गत महावीर कैंसर संस्थान, महावीर वात्सल्य हॉस्पिटल, महावीर आरोग्य हॉस्पिटल तथा अन्य बहुत से अनाथालय एवं अस्पताल चल रहे हैं। यहाँ श्री हनुमान जी संकटमोचन रूप में विराजमान हैं।

🌹16👉 श्री पंचमुख आंजनेयर हनुमान, ( तमिलनाडू)

तमिलनाडू के कुम्बकोनम नामक स्थान पर श्री पंचमुखी आंजनेयर स्वामी जी (श्री हनुमान जी) का बहुत ही मनभावन मठ है। यहाँ पर श्री हनुमान जी की “पंचमुख रूप” में विग्रह स्थापित है, जो अत्यंत भव्य एवं दर्शनीय है।

यहाँ पर प्रचलित कथाओं के अनुसार जब अहिरावण तथा उसके भाई महिरावण ने श्री राम जी को लक्ष्मण सहित अगवा कर लिया था, तब प्रभु श्री राम को ढूँढ़ने के लिए हनुमान जी ने पंचमुख रूप धारण कर इसी स्थान से अपनी खोज प्रारम्भ की थी। और फिर इसी रूप में उन्होंने उन अहिरावण और महिरावण का वध भी किया था। यहाँ पर हनुमान जी के पंचमुख रूप के दर्शन करने से मनुष्य सारे दुस्तर संकटों एवं बंधनों से मुक्त हो जाता है।
Rajesh Mishra, Kolkata

Rajesh Mishra, Kolkata

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

Hartalika Teej Vrat Katha


हरतालिका तीज व्रत कथा

हर साल यह त्योहार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागन महिलाओं के लिए हैं। इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं। इस व्रत में महिलाएं माता गौरी से सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद मांगती हैं। इसलिए विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है। यह कठिन होता है, क्योंकि इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं।


एक कथा के अनुसार माँ पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया। काफी समय सूखे पत्ते चबाकर काटी और फिर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा पीकर ही जीवन व्यतीत किया। माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता अत्यंत दुखी थे।

इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वतीजी के विवाह का प्रस्ताव लेकर माँ पार्वती के पिता के पास पहुंचे जिसे उन्होंने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। पिता ने जब माँ पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो वे बहुत दु:खी हो गईं और जोर-जोर से विलाप करने लगीं।

फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वे यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही हैं, जबकि उनके पिता उनका विवाह विष्णु से कराना चाहते हैं। तब सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गईं और वहां एक गुफा में जाकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं। माँ पार्वती की इस तपस्वनी रूप को नवरात्रि के दौरान माता शैलपुत्री के नाम से पूजा जाता है।

भाद्रपद तृतीया शुक्ल के दिन हस्त नक्षत्र को माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया। तब माता के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इच्छानुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।

मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती हैं, वे अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करती हैं। साथ ही यह पर्व दांपत्य जीवन में खुशी बरकरार रखने के उद्देश्य से भी मनाया जाता है।
Rajesh Mishra, Kolkata

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

भगवान् जगन्नाथ मंदिर का रहस्य

राजेश मिश्रा द्वारा संकलित

भगवान्_कृष्ण_ने_जब_देह_छोड़ा_तो उनका अंतिम संस्कार किया गया , उनका सारा शरीर तो पांच तत्त्व में मिल गया लेकिन उनका हृदय बिलकुल सामान्य एक जिन्दा आदमी की तरह धड़क रहा था और वो बिलकुल सुरक्षित था , उनका हृदय आज तक सुरक्षित है जो भगवान् जगन्नाथ की काठ की मूर्ति के अंदर रहता है और उसी तरह धड़कता है , ये बात बहुत कम लोगो को पता है महाप्रभु का महा रहस्य सोने की झाड़ू से होती है सफाई...... महाप्रभु जगन्नाथ (श्री कृष्ण) को कलियुग का भगवान भी कहते है....
Rajesh Mishra, Kolkata in Puridham

पुरी (उड़ीसा) में जग्गनाथ स्वामी अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ निवास करते है... मगर रहस्य ऐसे है कि आजतक कोई न जान पाया हर 12 साल में महाप्रभु की मूर्ती को बदला जाता है,उस समय पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट किया जाता है यानी पूरे शहर की लाइट बंद की जाती है। लाइट बंद होने के बाद मंदिर परिसर को crpf की सेना चारो तरफ से घेर लेती है...उस समय कोई भी मंदिर में नही जा सकता... मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है...पुजारी की आँखों मे पट्टी बंधी होती है...पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है..वो पुरानी मूर्ती से "ब्रह्म पदार्थ" निकालता है और नई मूर्ती में डाल देता है...ये ब्रह्म पदार्थ क्या है आजतक किसी को नही पता...इसे आजतक किसी ने नही देखा. ..हज़ारो सालो से ये एक मूर्ती से दूसरी मूर्ती में ट्रांसफर किया जा रहा है... ये एक अलौकिक पदार्थ है जिसको छूने मात्र से किसी इंसान के जिस्म के चिथड़े उड़ जाए... इस ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है...मगर ये क्या है ,कोई नही जानता... ये पूरी प्रक्रिया हर 12 साल में एक बार होती है...उस समय सुरक्षा बहुत ज्यादा होती है... मगर आजतक कोई भी पुजारी ये नही बता पाया की महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ती में आखिर ऐसा क्या है ???
 कुछ पुजारियों का कहना है कि जब हमने उसे हाथमे लिया तो खरगोश जैसा उछल रहा था...आंखों में पट्टी थी...हाथ मे दस्ताने थे तो हम सिर्फ महसूस कर पाए... आज भी हर साल जगन्नाथ यात्रा के उपलक्ष्य में सोने की झाड़ू से पुरी के राजा खुद झाड़ू लगाने आते है...
भगवान जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार से पहला कदम अंदर रखते ही समुद्र की लहरों की आवाज अंदर सुनाई नहीं देती, जबकि आश्चर्य में डाल देने वाली बात यह है कि जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देंगी आपने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे-उड़ते देखे होंगे, लेकिन जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता। झंडा हमेशा हवा की उल्टी दिशामे लहराता है दिन में किसी भी समय भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती।
भगवान जगन्नाथ मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदला जाता है, ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा इसी तरह भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है, जो हर दिशा से देखने पर आपके मुंह आपकी तरफ दीखता है। भगवान जगन्नाथ मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, जिसे लकड़ी की आग से ही पकाया जाता है, इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है। भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है। ये सब बड़े आश्चर्य की बात हैं..
Rajesh Mishra, Kolkata
 🚩जय द्वारकाधीश 🚩
 🚩 जय श्री जगन्नाथ 🚩

सोमवार, 13 जुलाई 2020

18 जुलाई को सावन की शिवरात्रि, विशेष फलदायी है यह दिन



श्रावण मास में शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर शिवरात्रि मनाई जाती है। फाल्गुन और श्रावण मास की शिवरात्रि को विशेष फलदायी माना गया है। इस बार श्रावण मास की शिवरात्रि 18 जुलाई 2020, शनिवार को मनाई जाएगी।
जब मनुष्य पर हर ओर से संकट आ जाता है और जीवन में अधंकार छा जाता है तो शिवभक्ति रूपी नैया से सभी बाधाएं और कष्ट मिटते हैं। सुखद जीवन के लिए आप भी भोलेभंडारी की शरण में जाएं, श्रावण मास की शिवरात्रि पर अपनाएं यह आसान उपाय, क्योंकि इस दिन यह उपाय करने से जीवन के सब संकट कट जाते हैं। आइए जानें...



अचूक उपाय :-


1. सुबह स्नान कर यथासंभव सफेद वस्त्र पहन घर या शिवालय में शिवलिंग को पवित्र जल से स्नान कराएं।


2. स्नान के बाद यथाशक्ति गन्ने के रस की धारा शिवलिंग पर नीचे लिखें मंत्र या पंचाक्षरी मंत्र नम: शिवाय बोलकर अर्पित करें -


रूपं देहि जयं देहि भाग्यं देहि महेश्वर:।


पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे।।

3. गन्ने के रस से अभिषेक के बाद पवित्र जल से स्नान कराकर गंध, अक्षत, आंकड़े के फूल, बिल्वपत्र शिव को अर्पित करें। सफेद व्यंजनों का भोग लगाएं। किसी शिव मंत्र का जप करें।


4. धूप, दीप व कर्पूर आरती करें।


5. अंत में क्षमा मांगकर दुखों से मुक्ति व रक्षा की कामना करें।

रविवार, 12 जुलाई 2020

Bhojpuri ke Shekspiyar Sri Bhikhari Thakur

भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर

संक्षिप्त परिचय : जीवनी - राजेश मिश्रा 
Sri Bhikhari Thakur

अपने नाटकों और गीत-नृत्यों के माध्यम से भोजपुरी समाज की समस्याओं और कुरीतियों को सहज तरीके से नाच के मंच पर प्रस्तुत करने वाले भोजपुरी के ‘शेक्सपियर’ महान साहित्यकार भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी भाषा को लोकप्रिय बनाकर पूरी दुनिया में उसका प्रसार किया।


भले मेरा जन्म इस अनंत प्रतिभाशाली, गौरवमयी और भोजपुरी के शेक्सपियर श्री भिखारी ठाकुर जी के मरणोपरांत हुआ पर इनके प्रतिभा का प्रकाश मुझ पर भी गहरा पड़ा। जिससे मैं इन्हें कभी भूल नहीं सका। मैं राजेश मिश्रा ग्राम-भेल्दी, जिला-छपरा (सारण ), बिहार निवासी श्री ठाकुर के चरणों में बारम्बार नमन करता हूँ। भोजपुरी को विश्व में सम्मान दिलाने के लिए मैं श्री ठाकुर जी को बार बार श्रद्धासुमन अर्पण करता हूँ। कहीं कोई त्रुटि रह जाये इस लेख में तो हमरा के माफ़ कइल जाओ। इंसान से ही भूल होला। जितना खुद के पास जानकारी रहे यहां प्रस्तुत करतानी। इ आलेख में न्यूज़ सर्विस वार्ता से भी कुछ अंश लेल गइल बा।
Rajesh Mishra, Kolkata


बिहार के छपरा (सारण) जिले के एक छोटे से गांव कुतुबपुर दियारा में 18 दिसम्बर 1887 को एक नाई परिवार में जन्में भिखारी ठाकुर के पिता दलसिंगर ठाकुर और मां शिवकली देवी सहित पूरा परिवार अपने जातिगत पेशा जैसे कि उस्तरे से हजामत बनाना, चिट्ठी नेवतना, शादी-विवाह, जन्म-श्राद्ध और अन्य अनुष्ठानों तथा संस्कारों के कार्य किया करते थे। परिवार में दूर तक गीत, संगीत, नृत्य, नाटक का कोई माहौल नहीं था।
Bhojpuri ke Shekspiyar Bhikhari Thakur


भिखारी ठाकुर जब महज नौ वर्ष के थे तब उन्होंने पढ़ने के लिए स्कूल जाना शुरू किया। एक वर्ष तक स्कूल जाने के बाद भी उन्हें एक भी अक्षर का ज्ञान नहीं हुआ तब वह अपनी गाय को चराने का काम करने लगे। धीरे-धीरे अपने परिवार के जातिगत पेशे के अंतर्गत भिखारी हजामत बनाने का काम भी करने लगे। इस दौरान उन्हें दोबारा पढ़ने-लिखने की इच्छा हुई। गांव के ही एक लड़के भगवान साह ने भिखार को पढ़ाया। बाद में रोज़ी-रोटी की तलाश में वह खड़गपुर (बंगाल) चले गए। वहां से फिर मेदनीपुर (बंगाल) गए, जहां उन्होंने रामलीला देखी। कुछ समय बाद वह बंगाल से वापस अपने गांव आ गए और गीत-कविता सुनने लगे। सुन कर लोगों से उसका अर्थ पूछकर समझने लगे और धीरे-धीरे गीत-कविता, दोहा-छंद लिखना शुरू कर दिया।

भिखारी ठाकुर ने वर्ष 1917 में अपने कुछ मित्रों के साथ एक मंडली बनायी और रामलीला, भजन और कीर्तन करने लगे। हालांकि उनके अंदर अभी भी अपने गांव से दूर रह रहे उन मजदूरों के लिए दर्द भरा पड़ा था, जिसे वह अपने नाटकों में मंचन कर जीवंत करने लगे। उनके नाटकों में समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों की पीड़ा और दुर्दशा साफ तौर पर झलकती है। उन्होंने अपने नाटकों के माध्यम से समाज में फैली कुरीतियों पर गहरा प्रहार किया। भोजपुरी भाषा में बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा, भाई-बिरोध, पिया निसइल, गंगा-स्नान, नाई-बाहर, नकल भांड और नेटुआ सहित कई नाटक, सामाजिक-धार्मिक प्रसंग गाथा और गीतों की रचना की है।
भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों और गीत-नृत्यों के माध्यम से तत्कालीन भोजपुरी समाज की समस्याओं और कुरीतियों को सहज तरीके से नाच के मंच पर प्रस्तुत किया था। उनके नाच में किया जाने वाला बिदेसिया उनका सबसे प्रसिद्ध नाटक है। इस नाटक का मुख्य विषय विस्थापन है। इसमें रोजी-रोटी की तलाश में विस्थापन, घर में अकेली औरत का दर्द, शहर में पुरुष का पराई औरत के प्रति मोह को दिखाया गया है। जिस तरह पारसी थिएटर एवं नौटंकी मंडलियां देश के अनेक शहरों में जा-जा कर टिकट पर नाटक दिखाया करती थी उसी तरह नाच मंडलियां भी टिकट पर नाच करती थी। भिखारी ठाकुर ने असाम, बंगाल, नेपाल में खूब टिकट शो किए। राजघरानों सहित ज़मींदार भी उन्हें बुलाते थे।
अपने समय में भिखारी ठाकुर नाच विधा के स्टार कलाकार बन गए थे। अंग्रेज़ों ने ‘राय बहादुर’की उपाधि दी तो हिंदी के साहित्यकारों के बीच ‘भोजपुरी के शेक्सपियर’ और ‘अनगढ़ हीरा’ जैसे नाम से सम्मानित हुए। उनकी प्रसिद्धी इतनी बढ़ गई थी कि उनके नाच के सामने लोग सिनेमा देखना तक पसंद नहीं करते थे। उनकी एक झलक पाने के लिए लोग कोसों पैदल चल कर रात-रात भर नाच देखते थे।
कवि, गीतकार, नाटककार, नाट्य निर्देशक, लोक संगीतकार और अभिनेता भिखारी ठाकुर की शख्सियत ने देश की सीमा तोड़ विदेशों में भी भोजपुरी को पहचान दिलाई। देश की सभी सीमाएं तोड़कर उन्होंने अपनी मंडली के साथ मॉरीशस, केन्या, सिंगापुर, नेपाल, ब्रिटिश गुयाना, सूरीनाम, युगांडा, म्यांमार, मैडागास्कर, दक्षिण अफ्रीका, फिजी, त्रिनिडाड और अन्य जगहों पर भी दौरा किया, जहां भोजपुरी संस्कृति है। वहीं, इनके नाटकों में होने वाला लौंडा नाच आज भी बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल में देखने को मिलता है। भिखारी ठाकुर कई कामों में व्यस्त रहने के बावजूद भोजपुरी साहित्य की रचना में भी लगे रहे। उन्होंने तकरीबन 29 पुस्तकें लिखीं, जिस वजह से आगे चलकर वह भोजपुरी साहित्य और संस्कृति के संवाहक बने। भिखारी ठाकुर की किताबें वाराणसी, हावड़ा और छपरा से प्रकाशित हुई।
भिखारी ठाकुर की लोकप्रियता को सिनेमा जगत के लोगों ने भी खूब भुनाया। बिदेसिया नाटक की कहानी पर फ़िल्म बनाने का प्रस्ताव उन्हें मिला। वह बंबई (अब मुंबई) बुलाए गये। उनको मंच पर बैठा कर एक गाना भी शूट हुआ और 1963 में बिदेसिया नाम से बनी फिल्म रिलीज हुयी। फ़िल्म की शुरुआत में इस बात का खूब प्रचार किया गया कि भिखारी ठाकुर की बिदेसिया पहली बार बड़े परदे पर। साथ ही साथ यह भी प्रचार किया गया कि इस फ़िल्म में ख़ुद भिखारी ठाकुर मौजूद हैं।
Rajesh Mishra, Kolkata

भिखारी ठाकुर के नाम का प्रभाव बिहार, उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बंगाल, असाम सहित देश के अनेक हिस्सों में फैले भोजपुरियों के बीच खूब था। उनको देखने के लिए लोग सिनेमा हॉल में टूट पड़े। फ़िल्म खूब चली लेकिन जनता जिन्होंने पहले बिदेसिया नाटक देखा था उनको निराशा हुई ।
भोजपुरी क्षेत्र में नाच और भिखारी ठाकुर पर्यायवाची की तरह हैं। नाच के संदर्भ में भिखारी ठाकुर की ये पंक्तियां “नाच ह कांच, बात ह सांच, एह में लागे ना सांच” नाच विधा के कई पहलुओं को इंगित करती हैं। यहां पर कांच शब्द का तात्पर्य कच्चा, क्षणभंगुर है। भिखारी ठाकुर ने इन पंक्तियों के माध्यम से यह बताया है कि ‘नाच है तो कच्ची और क्षणभंगुर चीज़, पर यह सच्चाई की बात करता है जिसे किसी आंच यानी परीक्षा से डर नहीं है। भोजपुरी के समर्थ लोक कलाकार, रंगकर्मी जागरण के संदेश वाहक, लोकगीत और भजन-कीर्तन के अनन्य साधक इस अमर कलाकार का 10 जुलाई 1971 को निधन हो गया।
Rajesh Mishra, Kolkata
Birth Palace : Bheldi, Saran, Bihar

रविवार, 22 मार्च 2020

Poila Baishakh - Bangali New Year

शुभो नबबर्षो - बंगाली नया साल



बंगाली नया साल 14 या 15 अप्रैल को प्रति वर्ष मनाया जाता है। इस दिन पोएला बोइशाख होता है। पोएला का अर्थ है पहला और बोइशाख बंगाली कैलेंडर का पहला महीना है। नाम चाहे कुछ भी हो पोएला बोइशाख भारत के पशिचम बंगााल ,असम ,ति्रपुरा ,झारखंड ,ओडिशा और जहां जहां भी बंगाली या इन प्रांतों के लोग रहते हैं वहां इसको बहुत धूम धाम से मनाया जाता है। भारत के अलावा कुछ अन्य देशों में भी पोएला बोइशाख को नया साल मनाया जाता है पर आज का बांगलादेश में नया साल पोएला बोइशाख के नाम से मनाते हैं क्योंकि भारत पाकिस्तान बंटवारे से पहले यह पूर्व बंगाल था। इस बार पोएला बोइशाख 15 अप्रैल को है।बंगाली नये साल की पारंपरिक शुभकामना है शुभो नबबर्षो अर्थात पोएला बोइशाख को बंगाली समुदाय के लोग एक दूसरे को;अनजान लोगों को भीद्ध देखकर शूभो नबबर्षो कहते हैं।
Rajesh Mishra, Kolkata, West Bengal
Bangali New Year, Poila Baishakh



सम्राट अकबर और बंगाली कैलेंडर-
बंगाली कैलेंडर हिन्दू वैदिक सौर मास , सूर्य सिद्धांत पर आधारित है। मुगल सम्राट अकबर ने बंगाली कैलेंडर का इस्तेमाल करना प्रारंभ किया क्योंकि यह उन्हें कर अदायगी के लिए सुविधाजनक लगा। हिजरी मूलत: चन्द्र मास पर आधारित है इसलिए यह फसलों पर आधारित नहीं है। इससे प्रजा को कर देने में बहुत परेशानी होती थी। बंगाली कैलेंडर सौर मास पर आधारित होने के कारण पूरी तरह फसलों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। सम्राट अकबर के राज ज्योतिष आमिर फतेउल्लाह सिराजी ने इस कैलेंडर का विकास किया । प्रारंभ में इस कैलेंडर को 'फसली सन कहा गया। बाद में इसे बंगाब्दो कहा जाने लगा। आज भी यह नाम प्रचलन में है। कैलेंडर का प्रारंभ 10 - 11 मार्च 1584 में हुआ था लेकिन इसमें तारीख 5 नवंबर 1556 या 963 हिजरी से थी। यह वह दिन था जिस दिन पानीपत की दूसरी लड़ाई में अकबर ने हेमू को हराया था। अकबर का आदेश था कि साल के अंतिम महीने चोइत्रो मास के अंतिम दिन तक सारे कर जमा हो जाने चाहिए। इसके अगले दिन नया साल शुरू होता था और इसके साथ ही व्यापारियों का नया खाता जिसे हालखाता कहा जाता था। हालखाता का प्रचलन बंगाल में आज भी है। अकबर के समय में भी इस दिन मेला लगता था , लोग मिठाई बांटते थे , व्यापारी मिठाई खिलाकर लोगों से नया व्यापारिक संबंध प्रांरभ करते थे। धीरे धीरे पोएला बोइशाख खुशियां मनाने का दिन बन गया।



बंगाल में नबबर्षो -


कोलकाता में प्रभात फेरी


बंगाल में बोइशाख का पूरा महीना शुभ माना जाता है। इस दिन लोग नये कपड़े पहनकर एक दूसरे से मिलते हैं ओर शूभो नबबर्षो कहते हैं।


कोलकाता का चोइत्रो सेल

कोलकाता के बाजारों में साल के अंतिम महीने चोइत्रो में सेल लगता है जिसे चोइत्रो सेल कहते हैं। इस सेल में कीमतें काफी कम रहती हैं । बहुत लोग इसी समय साल भर का जरूरी सामान खरीद लेते हैं। कोलकाता का यह सेल बहुत प्रसिद्ध है। दूसरे शहरों से बंगाली और बांगलादेश से भी लोग इस सेल में खरीददारी करने आते हैं।

बंगााल में इस दिन परिवार की समृद्धि और भलाई के लिए पूजा होती है। कोलकाता के प्रसिद्ध काली मंदिर काली घाट में पोएला बोइशाख की पूर्व राति्र से ही पूजा चढ़ाने के लिए लोग लाईन में खड़े रहते हैं। बंगाली महिलाएं इस दिन लाल किनारे की सफेद साड़ी और पुरूष धूती , पांजाबी ;धोती कुर्ताद्ध पहनकर भोर में प्रभात फेरी निकालकत नये साल का स्वागत करते हैं। नया व्यापार, नयी संस्थाएं प्रारंभ करने के लिए यह बहुत शुभ दिन है। इस दिन व्यापार के अलावा भी किसी प्रकार का शुभ कार्य किया जा सकता है।



हालखाता की पूजा

बंगाली हिंदू व्यापारी इस दिन हिसाब किताब का नया खाता खरीदते हैं।इसे हालखाता करते हैं। पूजा के बाद ही इसमें हिसाब लिखना शुरू होता है।पूजा के दौरान पंडित मंत्र पढ़ते हैं और हालखाता पर स्वासितक का चिन्ह बनाते हं।



कोलकाता के नन्दन में बंगाली नव वर्ष



कोलकाता के मुहल्लों के सांस्कृतिक कार्यक्रम

पोएला बोइशाख सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दिन है। पशिचम बंगाल में इस दिन कई स्थानों पर मेले लगते हैं। सबसे प्रसिद्ध है बंगला संगीत मेला। यह नन्दन - रवींद्र सदन के मैदान में होता है। मुहल्लों में छोटे पैमाने पर नृत्य और संगीत का कार्यक्रम आयोजित होता है। इस शहर में इस दिन कविगुरू रवींद्रनाथ टेगोर का प्रसिद्ध गीत ' एशो हे बोइशाख एशो एशो गूंजता रहता है। इस गीत का अर्थ है आओ बोइशाख आओ आओ अर्थात नये साल का आवाहन।



बंगाली भोजन की पारंपरिक थाली
इस सबके अलावा इस दिन का मुख्य आकर्षण होता है भोज जिसमें मांस , मछली , विभिन्न प्रकार के छेने की मिठाइयों की प्रधानता होती है। लोग एक दूसरे को घर पर भोजन के लिए आमंति्रत करते हैं। अपर सोसाइटी के कुछ लोग पार्टी भी करते हैं। होटलों में इस दौरान बंगाली फूड फेसिटवल होता है। घर में छोटे बड़ों के पैर छूते हैं और घर के बाहर भी मिठाई लेकर बड़ों के पैर छूने जाते हैं। बंगाल के ग्रामीण इलाकों में मेले होते हैं जहां गांव के कारीगर दुकान लगाते हैं और गांव के बच्चों तथा महिलाओं के लिए अपने शौक पूरे करने का अच्छा अवसर होता है। कोलकाता की तर्ज पर ही बंगाल के बाहर रह रहे बंगाली पोएला बोइशाख मनाने का पूरा प्रयास करते हैं।


बांगलादेश में नबबर्षो -


आज सुबह ढ़ाका में खुशियां मनाते लोग

आज के बांगलादेश के सभी पर्व त्यौहार भारत के पशिचम बंगाल से मिलते जुलते हैं क्योकि बांगालादेश , बंटवारे से पहले भारत का अभिन्न हिस्सा था। तब इसे पूर्वी बंगाल कहा जाता था। बंटवारे के समय भारत के हिस्से पशिचम बंगाल आया और पाकिस्तान के हिस्से पूर्वी बंगाल जिसे पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था। सन 1971 में पूर्वी पाकिस्तान , बांगलादेश नाम से एक स्वतंत्र देश बना। लेकिन कभी तो पशिचम बंगाल और पूर्वी बंगाल एक ही देश के दो प्रांत रहे इसलिए केवल पर्व त्यौहार ही नहीं खाना पीना , नृत्य ,संगीत , साज - सज्जा , पहनावा , भाषा ,संस्कृति सब ही पशिचम बंगाल और बांगलादेश का एक ही है।


छायानट के सदस्य रामना मैदान में नये साल का आवाहन करते हुए





ढ़ाका विश्वविधालय के छात्र मंगल शोभा यात्रा निकालते हुए


बांगलादेश का नया साल पोएला बोइशाख को ही होता है और इसे इसी नाम से जाना जाता है। बांगलादेश की राजधानी ढ़ाका में इसे बहुत धूम धाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। बांगलादेश के अन्य शहरों में भी लोग जोश के साथ इस दिन को उत्सव की तरह मनाते हैं। पोएला बोइशाख के दिन भोर में सबसे पहले कार्यक्रम की शुरूआत वहां के एक प्रसि़द्ध सांस्कृतिक दल छायानट द्वारा होता है। छायानट का प्रारंभ 1961 में हुआ था। छायानट के सदस्य रामना मैदान में वट वृक्ष के नीचे एकति्रत होकर कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर का गीत ' एशो हे बोइशाख गाते हैं। नये साल के आवाहन के साथ ही वहां के लोग इसे मनाना प्रारंभ करते हैं। इसके बाद ढ़ाका विश्वविधालय के फाईन आर्टस ;कलाद्ध विभाग के छात्र मंगल शोभायात्रा निकालते हैं। यह शोभायात्रा बहुत रंग बिरंगी होती है। इसकी थीम ;विषय वस्तुद्ध हर वर्ष बदल जाती है। अनेक सांस्कृतिक दल एवं बैंड कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। मेला का आयोजन होता है जिससे बांगलादेश की संस्कृति झलकती है।


ढ़ाका में नये साल पर नृत्य का कार्यक्रम

यहां बांगला गीतों पर आधरित नृत्य का कार्यक्रम होता है।सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा मुंशीगंज में सांड़ों की दौड़ , चटटग्राम में कुश्ती , नौका दौड़ , मुर्गी की लड़ाई , कबूतरों की लड़ाई से भी नया साल मनाया जाता है। बांगलादेश में यह छुटटी का दिन होता है।

चटटग्राम के पहाड़ी क्षेत्र में नबबर्षो - इस क्षेत्र में भिन्न देशीय तीन अल्प संख्यक दल एक साथ मिलकर पोएला बोइशाख मनाते हैं।बोइसुक के ति्रपुरी लोग , सांगराई के मारमा लोग और बीजू के चकमा लोग चोइत्रो मास के अंतिम दिन को मनाते हैं। इस दिन यह पहाड़ी लोग पारंपरिक नृत्य एवं संगीत करते हैं। चटटग्राम के पहाड़ी क्षेत्र में यह दिन पबिलक हालीडे है। चटटग्राम विश्वविधालय के छात्र भी इसे मनाते हैं।


पान्ता ईलीश
इस दिन बांगलादेश में भी लोग एक दूसरे को बधाइयां देते हैं , घर में तरह तरह के व्यंजन बनते हैं , लोग एक दूसरे को भोज पर निमंति्रत करते हैं ,घूमने जाते हैं इत्यादि। परंतु नये साल पर वहां का सबसे पारंपरिक भोजन है पान्ता ईलीश। रात के बचे हुए चावल में पानी डालकर रख दिया जाता है। दूसरे दिन सुबह पानी से चावल को निकालकर अलग कर लेते हैं इसे पान्ता भात कहते हैं। इस दिन पान्ता के साथ ईलीश यानि हिल्सा मछली खाते हैं। पान्ता के साथ तला हुआ हिल्सा मछली का टुकड़ा , सूखी मछलियां जिसे शूंटकी कहते हैं , दाल ,अचार और हरी मिर्च , कच्चा प्याज ,नमक खाते हैं। इसी को पान्ता ईलीश कहते हैं।

इसके अलावा विदेशों में रहने वाले बंगाली भी पोएला बोइशाख मनाते हैं।कहा जाता है कि विश्व का शायद ही कोई देश होगा जहां बंगाली समुदाय के लोग न हों।

आस्ट्रेलिया में नबबर्षो -


मेलबोर्न में बंगाली नये साल पर सांस्कृतिक कार्यक्रम

आस्ट्रेलिया के कई शहरों में बंगाली नया साल मनाया जाता है जैसे सिडनी , मेलबोर्न ,कैनबेरा। यहां का बंगाली समुदाय इस दिन की बहुत प्रतीक्षा करता है। यहां के शहरों में बोइशाखी मेला लगता है। यहां पर शहर भर के बंगाली समुदाय के लोग आते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं जिसमें बंगाली संस्कृति की झलक मिलती है। इसमें नृत्य , संगीत , फैशन शो होता है। कला, संगीत ,पहनावा ,खान पान इत्यादि का स्टाल लगता है। लेकिन हर चीज से बंगाली संस्कृति झलकती है। आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में बंगाली नया साल सबसे अधिक धूम धाम से मनाया जाता है। सिडनी के बोइशाखी मेला में भारत के बंगालियों के अलावा बांगलादेशियों की अच्छी खासी भीड़ होती है। आस्ट्रेलिया में एक साथ इतने बांगलादेशियों की भीड़ तो सिडनी बोइशाखी मेला में ही देखने को मिलती है। पहले यह मेला सिडनी के बरवुड गल्र्स हाई स्कूल में होता था पर 2006 से यह सिडनी आलिंपिक पार्क में होने लगा।

स्वीडन - स्वीडन का बंगाली समुदाय भी नया साल जोश के साथ मनाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे नृत्य , संगीत होता है। स्वीडन का बांगलादेश स्टूडेन्टस एसोसिएशन इस अवसर पर बांगलादेश के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करता है।

यूनाइटेड किंगडम -


लंडन का बोइशाखी मेला


यहां का बंगाली समुदाय बंगाली नया साल लंडन के स्ट्रीट फेसिटवल और बोइशाखी मेला के साथ मनाता है। भारी संख्या में बंगाली इसमें भाग लेते हैं। यह यूरोप में सबसे बड़ा एशियाई पर्व है। बांगलादेश और भारत के पशिचम बंगाल के बाद यू के ही ऐसा देश है जहां सबसे बड़े पैमाने पर यह बंगाली पर्व मनाया जाता है।

जैसा कि पहले कहा गया है कि विश्व के हर देश में यह समुदाय मौजूद है। ठीक वैसे ही जहां भी इस समुदाय के लोग रहते हैं वह अपनी तरह से बंगाली नया साल भी मनाते हैं। यहां तक कि सउदी अरब में भी बंगाली अपना नया साल मनाते हैं।

बंगालियों के अलावा पोएला बोइशाख के दिन अनेक प्रांतों और देशों में अलग अलग नाम से नया साल मनाया जाता है। भारत के असम में बिहू ,केरल में विशू , ओडिशा में महा विषुवा संक्रांति , तामिल नाडू में पुथांडू , कर्नाटक में तुलूवा । बर्मा देश में थिंगयान ,कंबोडिया में चोल चनाम थमेय, लाओस में सांगकन , नेपाल में बिक्रम संवत , श्री लंका में आलुथ अवरूधू , थाइलैंड में सांगकरान , मिथिला में जूड शीतल।

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

Saraswati Puja Vidhi Mantra

सरस्वती पूजा विधि मंत्र जिनसे माता को कर सकते हैं प्रसन्न


कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्रव्रिता। वीणा वरा दंडमंडित करा या श्वेत पद्मासना ।।
या ब्रह्मच्युत शंकरा प्रभुतिभी देवी सदा वन्दिता। सामा पातु सरस्वती भगवती निशेश्य जाड्या पहा।।


माघ शुक्ल पंचमी तिथि को शास्त्रों में बसंत पंचमी कहा गया है। इसे श्रीपंचमी और सरस्वती पाकट्य दिवस भी कहा जाता है। इस दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है। इन मंत्रों और विध से देवी की पूजा करना अत्यंत शुभ फलदायी होगा।
मां सरस्वती की पूजा करने से आपको बुद्धि, ज्ञान, संगीत और कला में निपुणता का आशीर्वाद प्राप्त होगा। सरस्वती पूजा में सरस्वती वंदना जरूर करनी चाहिए। आइए जानते हैं कि वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा कैसे करनी चाहिए?

सरस्वती पूजा की विधि

वसंत पंचमी के दिन प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद पूजा स्थल पर मां सरस्वती की प्रतिमा या फोटो स्थापित करें। फिर गणेश जी और नवग्रह की पूजा करें। इसके बाद मां सरस्वती की पूजा करेंगे। सबसे पहले उनका गंगा जल से स्नान कराएं, फिर उनको सफेद और पीले फूल तथा माला अर्पित करें। देवी को पीले रंग के फल चढ़ाएं और उनके चरणों में गुलाल अर्पित करें। उनको सिंदूर और श्रृंगार की वस्तुएं भी चढ़ाएं। फिर धूप, दीप और गंध से उनको सुशोभित करें।

मां सरस्वती सफेद वस्त्र पहनती हैं, इसलिए उनको श्वेत वस्त्र अर्पित करें या पहनाएं। माता को सफेद रंग की मिठाई, खीर या मालपुए का भोग लगाएं। प्रसाद में पीले या केसरिया रंग के फलोंं और मिठाइयों को ग्रहण करें, इससे विशेष कृपा प्राप्त होगी।


इस मंत्र से प्रसन्न होंगी मां सरस्वती

''एमम्बितमें नदीतमे देवीतमे सरस्वति! अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि! ''
अर्थात -
मातृगणो में श्रेष्ठ, देवियों में श्रेष्ठ हे ! मां सरस्वती हमें प्रशस्ति यानी ज्ञान, धन व संपति प्रदान करें।

यदि पूर्व में दिए मंत्र को पढ़ने में परेशानी हो तो इस सरल मंत्र को पढ़कर मां सरस्वती को प्रसन्न कर ज्ञान का आशीर्वाद प्राप्त करें।

सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि ।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥

भगवती सरस्वती की पूजन प्रक्रिया में सर्वप्रथम आचमन, प्राणयामादि के द्वारा अपनी शुचिता संपन्न करें।
फिर सरस्वती पूजन का संकल्प ग्रहण करें । इसमें देशकाल आदि का संकीर्तन करते हुए अंत में 'यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः भगवत्याः सरस्वत्याः पूजनमहं करिष्ये।' पढ़कर संकल्प जल छोड़ दें।

तत्पश्चात आदि पूजा करके कलश स्थापित कर उसमें देवी सरस्वती साद आह्वान करके वैदिक या पौराणिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए उपचार सामग्रियां भगवती को सादर समर्पित करें।

मां सरस्वती का अष्टाक्षर मंत्र

'श्री ह्यीं सरस्वत्यै स्वाहा'

इस अष्टाक्षर मंत्र से प्रत्येक वस्तु क्रमशः श्रीसरस्वती को समर्पण करे। अंत में देवी सरस्वती की आरती करके उनकी स्तुति करें। भगवती को निवेदित गंध पुष्प मिष्ठान्न का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। पुस्तक और लेखनी में देवी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है अत: उनकी पूजा करें।

देवी भागवत एवं ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णित आख्यान में पूर्वकाल में श्रीमन्नरायण भगवान ने वाल्मीकि को सरस्वती का मंत्र बतलाया था। जिसके जप से उनमें कवित्व शक्ति उत्पन्न हुई थी।

सरस्वती वंदना

मां सरस्वती की पूजा करने के समय सरस्वती वंदना का स्मरण अवश्य करना चाहिए।
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता,
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं,
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌,
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

हवन

पूजा करने के बाद हवन करें। सबसे पहले गणेश जी और नवग्रह के नाम से हवन करें। इसके पश्चात 'ओम श्री सरस्वत्यै नम: स्वहा" मंत्र से 108 बार माता सरस्वती के लिए हवन करें। फिर सरस्वती माता की आरती करें और उन्हें अपनी मनोकामना से अवगत कराएं।

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

16 Sanskar : These Rituals are necessary from birth to death

जन्म से मृत्यु तक जरुरी हैं ये संस्कार

सनातन धर्म सबसे प्राचीन धर्म है। सनातन धर्म के लिए हमारे ऋषि-मुनि और महात्माओं नें तप और शोध किए। सनातन में जीवन को धर्म के साथ जोड़ने के लिए इंसान के पैदा होने से पहले से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कार बताए गए हैं। इन 16 संस्‍कारों के बारे में कई बार चर्चा की जाती है, लेकिन एक सच्‍चाई यह भी है कि अधिकांश लोग अब इनके बारे में नहीं जानते। हिन्‍दू धर्म को मानने वाले इनमें से सिर्फ कुछ ही संस्‍कारों का पालन कर पा रहे हैं।

Rajesh Mishra, Baba Somnath 


गर्भाधान: विवाह के बाद गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने पर पहले कर्तव्य के रुप में इस संस्कार को स्थान दिया गया है। उत्तम संतान कि प्राप्ति और गर्भाधान से पहले तन-मन को पवित्र और शुद्ध करने के लिए यह संस्कार करना आवश्यक है।
पुंसवन: पुंसवन गर्भाधान के तीसरे माह के दौरान होता है। इस समय गर्भस्थ शिशु का मस्‍तिष्‍क विकसित होने लगता है। इस संस्‍कार के जरिए गर्भस्थ शिशु में संस्कारों की नीव रखी जाती है।
सीमन्तोन्नयन: इस संस्कार को सीमंत संस्कार भी कहा जाता है। इसका अर्थ होता है सौभाग्य सम्‍पन्‍न होना। इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य गर्भपात रोकने के साथ साथ शिशु के माता-पिता के जीवन की मंगल कामना की जाती है।
जातकर्म: संसार में आने वाले शिशु को बुद्धि,स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना करते हुए सोने के किसी आभूषण या टुकड़े से गुरुमन्त्र के उच्चारण के साथ शहद चटाया जाता है। इसके बाद मां बच्चे को स्तनपान कराती है।
नामकरण: जन्म के 11 वें दिन शिशु का नामकरण संस्कार रखा जाता है। इसमें ब्राह्मण द्वारा हवन प्रक्रिया करके जन्म समय और नक्षत्रो के हिसाब से कुछ अक्षर सुझाए जाते हैं जिनके आधार पर शिशु का नाम रखा जाता है।
निष्क्रमण:
जन्म के चौथे माह में यह संस्कार निभाया जाता है। निष्क्रमण का मतलब होता है बाहर निकालना। इस संस्कार से शिशु के शरीर को सूर्य की गर्मी और चंद्रमा की शीतलता से मुलाकात कराई जाती है ताकि वह आगे जाकर जलवायु के साथ तालमेल बैठा सके।
अन्नप्राशन: जन्म के छह महीने बाद इस संस्कार को निभाया जाता है। जन्म के बाद शिशु मां के दूध पर ही निर्भर रहता है। छह माह बाद उसके शरीर के विकास के लिए अन्य प्रकार के भोज्य पदार्थ दिए जाते हैं।
चूड़ाकर्म: चूड़ाकर्म को मुंडन भी कहा जाता है। संस्कार को करने के बच्चे के पहले, तीसरे और पांचवे वर्ष का समय उचित माना गया है। इस संस्कार में जन्म से सिर पर उगे अपवित्र केशों को काट कर बच्चे को प्रखर बनाया जाता है।
Rajesh Mishra, Sury Darshan

विद्यारंभ: जब शिशु की आयु हो जाती है तो इसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है। इस संस्कार से बच्चा अपनी विद्या आरंभ करता है। इसके साथ-साथ माता-पिता औऱ गुरुओं को भी अपना दायित्व निभाने का अवसर मिलता है।
कर्णभेद: कर्णभेद संस्कार का आधार वैज्ञानिक है। बालक के शरीर की व्याधि से रक्षा करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य होता है। कान हमारे शरीर का मुख्य अंग होते हैं, कर्णभेद से इसकि व्याधियां कम हो जाती है और श्रवण शक्ति मजबूत होती है।
यज्ञोपवीत:यज्ञोपवीत यानी उपनयन संस्कार में जनेऊ पहना जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। यज्ञोपवीत सूत से बना वह पवित्र धागा है जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर और दाईं भुजा के नीचे पहनता है।
वेदारंभ: इस संस्कार के बाद व्‍यक्‍ति वेदों का ज्ञान लेने की शुरुआत करता है। इसके अलावा ज्ञान और शिक्षा को अपने अंदर समाहित करना भी इस संस्कार का उद्देश्य है।
केशांत: गुरुकुल में वेद का ज्ञान प्राप्त करने के बाद आचार्यों की उपस्थिति में यह संस्कार किया जाता है। यह संस्कार गृहस्थ जीवन में कदम रखने की शुरुआत माना जाता है।
समावर्तन: केशांत संस्कार के बाद समावर्तन संस्कार किया जाता है। इस संस्कार से विद्या पूर्ण करके समाज में लौटने का संदेश दिया जाता है।
16 Sanskar

विवाह:प्राचीन समय से ही स्त्री और पुरुष के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। सही उम्र होने पर दोनों का विवाह करना उचित माना जाता है।
अन्त्येष्टि: इंसान की मृत्यु होने पर उसका अंतिम संस्कार कराया जाना ही अंत्येष्टि कहा जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार मृत शरीर का अग्‍नि से मिलन कराया जाता है।

मोक्ष का सागर : गंगासागर

Rajesh Mishra, Kolkata, Gangasagar कई बार दौरा करने एवं वहां के लोगों से बातचीत के बाद राजेश मिश्रा को जो दिखा और पता चला उसी आधार पर मैं यह...